भाजपा की पहली सूची इब्तिदा ए इश्क़ है होता है क्या, आगे-आगे देखिये होता है क्या ?

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गोविन्द चतुर्वेदी
वरिष्ठ पत्रकार और मुख्यमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार

भारतीय जनता पार्टी ने राजस्थान में अपने 41 उम्मीदवारों की अपनी पहली सूची 9 अक्टूबर को जारी कर दी.. इस सूची में सात सांसद और दो पूर्व सांसद शामिल हैं.. जिन 41 सीटों पर भाजपा प्रत्याशी घोषित हुए हैं उनमें से 39 ऐसी हैं जिन पर वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा हारी हुई है.. सूची को देखते ही लग रहा था कि, यह भाजपा की राजनीति में हंगामा बरपायेगी..और वही हुआ.. उसी रात से शुरू हुआ हंगामा थमने का नाम नहीं ले रहा..बात बढ़ती और दूर तलक जाती नजर आ रही है.. लोगों को मीर तकी मीर का “ इब्तिदा ए इश्क़ है रोता है क्या,आगे-आगे देखिये होता है क्या “ याद आने लगा है..

भारतीय जनता पार्टी आलाकमान चुनाव वाले 5 राज्यों, खासतौर पर राजस्थान,मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जिस तरह से स्थापित नेतृत्व की अनदेखी कर सब कुछ अपने हाथ में लेकर फैसले कर रहा है, उसमें यह स्वाभाविक है.. दुनिया दिखाने के लिए वह पार्टी पर्यवेक्षक भी भेज रहा है, सर्वे भी करवा रहा है, राजी-गैर राजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी सुन रहा है लेकिन जिस तरह स्थापित नेतृत्व और अपनी राज्य इकाइयों की उपेक्षा कर रहा है उससे इन राज्यों में पार्टी का आगे का दृश्य उज्जवल नहीं दिख रहा.. शिवराज सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, श्रीमती वसुंधरा राजे राजस्थान की दो बार मुख्यमंत्री रही हैं और रमन सिंह 15 वर्ष छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रहे हैं.. ऐसे में इन नेताओ को टिकट वितरण के काम से दूध से मक्खी की तरह निकाल फेंकना भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को भले रास आए लेकिन इन राज्यों की जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं को वह रास आता नहीं लगता.. यह संभव है कि, पार्टी में उनका विरोध हो, पार्टी में उन्हें नापसंद करने वाले नेता और कार्यकर्ता हों, राजे और रमन के नेतृत्व में पार्टी उनके राज्यों में पिछला चुनाव हारी हो लेकिन ऐसा तो किसी भी नेता के साथ हो सकता है..पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्ढा के गृह राज्य हिमाचल प्रदेश में इसी वर्ष भाजपा विधानसभा चुनाव हारी है.. शिवराज सिंह तो अभी मुख्यमंत्री हैं.. फिर इन सब नेताओं का अपने-अपने राज्यों में बड़ा आधार और संपर्क है.. हो सकता है कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सहित अन्य केंद्रीय नेताओं के अपने सम्पर्क और प्रभाव हों लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि, अपने-अपने राज्यों में कम से कम इस चुनाव में तो इन नेताओं की भी हैसियत कम नहीं है.. इन तीनों राज्यों के चुनावी नतीजों पर, इन तीनों की उपेक्षा का तो असर पडेगा ही, इनके नतीजे वर्ष 2024 के आम चुनावों तक में ,भाजपा को भारी पड़ सकते हैं..

बात राजस्थान की करें तो भाजपा की पहली लिस्ट से 200 सीटों के लिए पार्टी उम्मीदवारों के चयन की दिशा का पता चलता है.. श्रीमती राजे की बात छोड़िये अगर राज्य के प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों को सही मानें तो यह स्पष्ट है कि, प्रत्याशी चयन में राज्य इकाई की भी नहीं चली है..जैसी की परम्परा है, भले रिकॉर्ड पर कोई नहीं बोले लेकिन ऑफ द रिकॉर्ड कही यह बात मायने रखती ही है कि, हमें भी नहीं पता कि, टिकट वितरण कैसे हुआ है ? यह जो जवाब है वह पार्टी की राज्य इकाई के उस आत्मविश्वास को दिखाता है जो चुनावी हार-जीत को तय करता है..अखबारों में छपने वाले ऐसे समाचारों का जनता में असर होता है.. विशेष रूप से राजस्थान जैसे राज्य की जनता में जो सदियों से अपने स्वाभिमान के लिए जानी जाती है.. इसका असर तुरंत पूरे राज्य में दिखाई दिया.. 24 घंटे पहले का कुछ सीटों तक सीमित विरोध व्यापक हो गया.. 41 में से करीब-करीब दो दर्जन सीटों पर विरोधी स्वर मुखर हो उठे जो अव्वल तो भाजपा की संस्कृति में ही नहीं हैं और उससे भी आगे पार्टी के मोदी युग में तो उसके लिए कोई जगह नहीं है..

अगर अभी हम अपनी बातचीत को 7 सांसदों तक ही सीमित रखें तो यह विरोध पार्टी के निष्ठावान और आलाकमान के प्रति निष्ठावानों का दिखता है.. श्रीमती दिया कुमारी,राज्यवर्धन सिंह राठौड़, बाबा बालकनाथ और देवजी पटेल ऐसे नाम हैं जिनकी जड़ें भाजपा में ज्यादा गहरी नहीं हैं..पार्टी के जानकार लोग बताते हैं कि, आलाकमान ने जो सूची जारी कर दी, वह अंतिम है.. यह सूची अंतिम रहे या इसमें परिवर्तन हो दोनों ही सूरतों में यह स्थिति मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व में अपनी जनहितकारी योजनाओं के सहारे आगे चल रही राज्य की कांग्रेस सरकार को मदद करने वाली लगती हैं.. यदि दिए हुए टिकट बदले तो फिर आगे की सूचियों में यही सिलसिला चलेगा।।

यदि टिकट नहीं बदले तो स्थिति उस बगावत तक पहुँच सकती है जिसकी शुरूआत राज्य के नगर विधानसभा क्षेत्र में पार्टी टिकट नहीं दिए जाने से नाराज श्रीमती अनीता सिंह गुर्जर ने चुनाव लड़ने की घोषणा करके की है.. पार्टी और राज्य की राजनीति के जानकारों के अनुसार बागी होकर लड़ना कांग्रेस कल्चर में ज्यादा है लेकिन इस बार राज्य भाजपा में भी इसके आसार ज्यादा नजर आ रहे हैं.. लोगों का मानना है कि, यदि ऐसा हुआ तो उसके पीछे श्रीमती राजे की उपेक्षा और अंततः उनकी शह कारण होंगे….
दिल्ली की मनमर्जी और राज्य के पार्टी नेताओं की अनदेखी के साथ यह सूची यह भी बताती है कि, शायद पार्टी की राष्ट्रीय और प्रादेशिक

इकाई में संवाद इकतरफा है.. वह दिन हवा हुए जब भैरोंसिंह शेखावत, जगदीश प्रसाद माथुर, गुमानमल लोढ़ा, सतीशचंद्र अग्रवाल, सुंदर सिंह भंडारी, ललितकिशोर चतुर्वेदी, हरिशंकर भाभड़ा, रामदास अग्रवाल, घनश्याम तिवाड़ी, भंवरलाल शर्मा और ओम प्रकाश माथुर सहित ऐसे नेताओं की लम्बी लिस्ट राज्य में पार्टी के हित पर बोलती थी.. अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी सरीखे दिग्गज पार्टी नेता भी उनकी सुनते थे और कई बार अपने फैसलों को बदलते भी थे.. राजस्थान की भाजपा सूची अभी इतना ही.. लम्बी बात पूरी सूची आने पर !!

@ मासिक समाचार ” पत्र माइंड प्लस ” के 15 अक्टूबर 2023 के अंक से