सरसों में हुए घाटे की भरपाई करे सरकार:रामपाल जाट

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वर्ष 2018 से प्रभाव में आई ‘प्रधानमंत्री अन्न दाता आय सरक्षण अभियान’ योजना अंतर्गत न्यूनतम समर्थन मूल्य की सुनिश्चित्ता का प्रावधान किया हुआ है । न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम प्राप्त होने पर उसके घाटे की भरपाई के लिए ;अंतर राशि’ देने का उल्लेख किया हुआ है ।

किसानो को हुए घाटे की भरपाई का दायित्व केंद्र सरकार का है किन्तु योजना प्रभाव में आने के 4 वर्ष पूर्ण होने पर भी सरकार ने इसकी पालना अभी तक नही की है । केंद्र सरकार तिलहन उत्पादन में देश को आत्मनिर्भर बनाने की घोषणा करती है लेकिन उसका आचरण उसके विपरीत है ।

न्यूनतम समर्थन मूल्य एवं बाजार के मूल्यो में 1250 से लेकर 450 रुपये तक का अंतर चल रहा है । राजस्थान की मंड़ियो में मार्च माह में 45.26 लाख क्विंटल सरसों की आवक रही है, जिसे ओसत के रूप में 700 रुपये प्रति क्विंटल की अंतर राशि के आधार पर किसानो को अनुमानित घाटा 316 करोड़ 82 लाख रुपये का हो चुका है । अप्रैल एवं मई माह की आवक इससे अलग है ।

उल्लेखनीय है कि गत वर्ष एक क्विंटल सरसों के दाम 8000 रुपये तक किसानों को प्राप्त हुए थे । भारत सरकार के अनुसार भी सरसों के औसत मूल्य 7444 रुपये प्रति क्विंटल रहे । इस वर्ष एक क्विंटल सरसों के लिए किसानों को 3000 रुपये तक कम दाम प्राप्त हो रहे हैं । न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद नहीं होने से किसानों को बाजार में अपनी सरसों कम दामों पर बेचने के लिए विवश होना पड़ रहा है । यह स्थिति तो तब है जब भारत सरकार संसद में निरंतर यह घोषणा कर रही है कि किसी भी किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दामों पर अपनी उपज बेचने को विवश नहीं होने दिया जाएगा ।

भारत सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य को खरीद की गारंटी बताते हुए अघाती नहीं है । इस समय तो बाजार में किसानों को 1 क्विंटल सरसों के दाम 4200 रुपये तक प्राप्त हो रहे हैं । जिन किसानों ने अपनी सरसों मंडी समितियों में विक्रय की है उनका संपूर्ण रिकॉर्ड वहा उपलब्ध है । जिसके आधार पर सरकार द्वारा घाटे की भरपाई के लिये किसानो के बैंक खातो में अंतर राशि सहजता से अंतरण की जा सकती है ।

ज्ञात रहे कि देश के संपूर्ण उत्पादन में से 49% सरसों अकेले राजस्थान में उत्पादित हुई है । देश में उपभोग होने वाले संपूर्ण खाद्य तेलों में अकेले सरसों का अंश एक तिहाई से अधिक है । कम पानी एवं कम खर्चे में पैदावार के लिए सरसों प्रमुख तिलहन है ।
भारत सरकार खाद्य तेल के आयात पर पिछले 1 वर्ष में ही 1,41,500 करोड़ व्यय कर चुकी है । इसके पूर्व एक दशक में खाद्य तेलों के आयात पर होने वाला व्यय 7,60,500 करोड रुपए है । इस तेल में 56% से अधिक अंश तो पाम आयल का है, जो खाने का तेल नहीं है । वह तो पेड़ों का स्वाद एवं सुगंध हीन तरल पदार्थ है । उसको खाने के तेल के नाम पर देश की जनता को परोसना देश के स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक है ।

देश के किसानों को उनकी तिलहन के उत्पादन का लाभकारी मूल्य प्राप्त हो जावे तो देश का किसान देश को खाद्य तेलों में भी आत्मनिर्भर बनाने में सक्षम है, जैसे खाद्यान्नों के संबंध में देश के किसानों ने देश की आवश्यकता से अधिक खाद्यान का उत्पादन का रिकोर्ड बनाया है ।

रामपाल जाट
राष्ट्रीय अध्यक्ष
किसान महापंचायत