भ्रष्टता निवारण है सशक्त लोकतंत्र का आधार

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झारखंड राज्य में जमीन खरीद में गड़बड़ी, अवैध खनन और मनी लॉन्ड्रिंग के कथित पुराने मामलों की जांच कर रही प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को गिरफ्तार कर लिया है। इस कार्रवाई से झारखंड की सरकार संकट में आ गयी और उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

भाजपा सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ केन्द्रीय एजेंसियों की कार्रवाई का बुगल बजाय हुए है, जिससे राजनीति में बढ़ रहे भ्रष्टाचार पर नियंत्रण का नया सूरज उदित होता हुआ दिखाई दे रहा है, जो दुनिया के सबसे बड़े भारत लोकतंत्र के आदर्श एवं सशक्त होने की बड़ी अपेक्षा है। आजादी के अमृत काल में राजनीति का शु़िद्धकरण एवं अपराध मुक्ति ही भारत को सशक्त एवं विकसित राष्ट्र बना सकेगा। हेमंत सोरेन के बाद अब अगला नम्बर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का है।

स्पष्ट है कि अब भ्रष्टाचारियों की नैया पार होने वाली नहीं है। अगर ये लोग सोचते हैं कि ताकतवर होने के कारण कानून उन तक नहीं पहुंच सकता, तो ये मुगालते में हैं। अगर उन्होंने भ्रष्टाचार किया है, तो उन्हें अपने किए की सजा मिलेगी ही। भ्रष्ट आचरण से करोड़ों-अरबों की संपत्ति लूटने वाले नेतागण शायद नहीं जानते कि केंद्र में ऐसी मजबूत सरकार है, जो भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करती। इसीलिए तो जांच एजेंसियों को पूरी छूट मिली हुई है कि वे भ्रष्ट आचरण करने वालों को पकड़ें। दबाव मुक्त केन्द्रीय एजेंसियां अपने काम में जुटी भी हुई हैं, उनकी टांग खिंचने की बजाय उनका हौसला बढ़ाना चाहिए।

इनदिनों गैरभाजपा प्रांतों में भ्रष्टाचार के मामले बड़ी संख्या में उजागर हो रहे हैं। इंडिया गठबंधन के प्रमुख घटक दल आम आदमी सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सतेन्द्र जैन, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया एवं पश्चिम बंगाल में उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी जेल की सलाखों के पीछे हैं, इनकी गिरफ्तारी बता रही है कि ममता बनर्जी एवं अरविन्द केजरीवाल भ्रष्टाचार मुक्त शासन के कितने ही दावे क्यों न करें, लेकिन उनके वरिष्ठ मंत्री भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के घेरे में हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों एवं विभिन्न प्रांतों की सरकारों में भ्रष्टाचार की बढ़ती स्थितियां गंभीर चिन्ता का विषय है। ऐसा लगता है आज हम जीवन नहीं, राजनीतिक मजबूरियां जी रहे हैं। राजनीति की सार्थकता एवं साफ-सुथरा उद्देश्य नहीं रहा, स्वार्थपूर्ति का जरिया बन गया है। राजनीतिक दल अच्छे-बुरे, उपयोगी-अनुपयोगी का फर्क नहीं कर पा रहे हैं।

मार्गदर्शक यानि नेता शब्द कितना पवित्र व अर्थपूर्ण था पर अब नेता खलनायक बन गया है। नेतृत्व व्यवसायी एवं भ्रष्टाचारी बन गया। आज नेता शब्द एक गाली है। जबकि नेता तो पिता का पर्याय था। उसे पिता का किरदार निभाना चाहिए था। पिता केवल वही नहीं होता जो जन्म का हेतु बनता है अपितु वह भी होता है, जो अनुशासन सिखाता है, ईमानदारी का पाठ पढ़ाता है, विकास की राह दिखाता है। आगे बढ़ने का मार्गदर्शक बनता है।

भ्रष्टाचार, राजनीतिक अपराधीकरण एवं जाति-सम्प्रदाय के हिंसक आग्रहों पर इंडिया गठबंधन में कोई बहस नहीं है, कोई आदर्श राष्ट्र निर्माण की दृष्टि एवं दिशा नहीं है। राजनीति में लगे लोगों में जब इन मसलों की गहराई तक जाने का धैर्य और गंभीरता चुक जाए, तो उनके मंच के संवाद पहले निम्न दर्जे तक गिरते हैं और फिर कीचड़ को ही संवाद का विकल्प मान लिया जाता है। इन दिनों यही हो रहा है। भ्रष्टाचार के लिए मोदी सरकार जो कार्रवाइयाँ कर रही हैं, वह सराहनीय है। भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुके ऐसे नेताओं की कमी नहीं है, जो यह मानते हैं कि सरकार उनकी है और वे कुछ भी कर सकते हैं। इस तरह की भ्रामक सोच भारतीय राजनीति का पतन कर रही है। इसकी शुचिता और पारदर्शिता को धूमिल कर रही है। पहले राजनीति का अर्थ लोगों की सेवा करना होता था, लेकिन बाद में यह अपने लोगों की सेवा का माध्यम समझी जाने लगी।

बिहार, बंगाल, दिल्ली और झारखंड जैसे राज्य तो इसमें सबसे ऊपर दिखते हैं। झारखंड में ही अभी जो घटनाक्रम हुआ है, क्या उससे यह धारणा नहीं बनती कि हेमंत सोरेन ने जरूर कुछ ऐसे कार्य किए हैं कि पहले उन्हें ईडी से भागना पड़ा और जब उन पर दबिश बढ़ी, तो उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर ईडी अधिकारियों के हाथों गिरफ्तार होना पड़ा।

बिहार का हाल भी झारखण्ड से अलग नहीं है। वहां पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का भ्रष्टाचार लगातार खबरों में रहा है, वे भी सजा भुगत चुके हैं। उनके पुत्र तेजस्वी यादव व अन्य परिजन पर भी जमीन घोटाले के आरोप हैं। कहा जाता है कि जब ईडी ने तेजस्वी यादव से सवाल पूछे, तो वह भी संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए। उन्होंने घोटाले के वक्त खुद के नाबालिग होने की बात कही। जब ईडी अधिकारियों ने पूछा कि करोड़ों की कंपनी कैसे बनाई, तो उन्होंने इस बारे में कोई जानकारी न होने की बात कही। जबकि लालू यादव के पास इतनी संपत्ति कैसे जमा हुई, यह कोई छिपा रहस्य नहीं है। इसलिए यह कयास भी गलत नहीं है कि देर-सबेर तेजस्वी यादव भी अपने पिता की तरह जेल में दिख सकते हैं। कुछ इसी तरह की कहानी देश के अन्य राज्यों में भी है, जहां मुख्यमंत्री और बड़े नेता ईडी के निशाने पर हैं, इसलिए मुमकिन है कि आने वाले दिनों में हम और भी कई नेताओं को कालकोठरी में देख सकते हैं।

बात केवल आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा राष्ट्रीय जनता दल, की ही नहीं है, भ्रष्टाचार जहां भी हो, उसकी खिलाफ बिना किसी पक्षपात के कार्रवाई की जानी चाहिए। भाजपा एक राष्ट्रवादी पार्टी है, नया भारत एवं सशक्त भारत को निर्मित करने के लिये तत्पर है तो उसकी पार्टी के भीतर भी यदि भ्रष्टाचार है तो उसकी सफाई ज्यादा जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी भ्ज्ञी दल के नेताओं के भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का बुगल बजाय हुए हैं तो यह आजादी के अमृत महोत्सव मनाने की सार्थक पहल है, जिसके माध्यम से वे भारत के विलक्षण और ऐतिहासिक प्रधानमंत्री माने जाएंगे। राजनीतिज्ञों की साख गिरेगी, तो राजनीति की साख बचाना भी आसान नहीं होगा। हमारे पास राजनीति ही समाज की बेहतरी का भरोसेमंद रास्ता है और इसकी साख गिराने वाले कारणों में अपराधीकरण और भ्राष्टचार के बाद तीसरा नंबर इस कीचड़ उछाल राजनीति का भी है, जिसमें गलत को गलत नहीं माना जाता।

ये तीनों ही राजनीति के औजार नहीं है, इसलिए राजनीति को तबाही की ओर ले जाते हैं। अपराधीकरण और भ्रष्टाचार का मसला काफी गहरा है और इससे खिलाफ लड़ाई के लिए काफी वक्त और ऊर्जा की जरूरत है, लेकिन कीचड़ उछाल से परहेज करके और सार्थक बहस चलाकर देश की राजनीति का सुधार आंदोलन शुरू किया जा सकता है। राजनैतिक कर्म में अपना जीवन लगाने वालों से इतनी उम्मीद तो की ही जानी चाहिए कि भ्रष्टाचार के खिलाफ होने वाली कार्रवाइयों को राजनीतिक रंग न दे। ऐसी ही उम्मीदभरी एवं स्वच्छ राजनीति से भारत का लोकतंत्र समृद्ध हो सकेगा।