‘सजनवा बैरी हो गए हमार…….

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14 दिसंबर शैलेंद्र की पुण्यतिथि और राजकपूर की जयंती पर विशेष

याद कीजिए ‘तीसरी कसम’ और याद कीजिए फ़िल्म के निर्माता शैलेंद्र और हीरा की भूमिका निभाने वाले राजकपूर को। यह फ़िल्म फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर आधारित थी। कहानी का चयन बहुत बढ़िया था। निर्देशक बासु भट्टाचार्य थे जो इससे पहले प्रसिद्ध निर्देशक बिमल राय के सहायक के रूप में काम कर चुके थे। फ़िल्म के लिए गीत शैलेंद्र और उनके ही मित्र हसरत जयपुरी ने लिखे थे और इन गीतों का शानदार संगीत शंकर जयकिशन ने तैयार किया था। राजकपूर पर फिल्माए गए सभी गीतों को मुकेश ने अपनी दर्द भरी आवाज़ में गाकर अपनी अमिट छाप छोड़ी थी। कौन भूल सकता है ‘सजनवा बैरी हो गए हमार…….’ जैसा गीत, ‘दुनिया बनाने वाले…….’ या फिर ‘सजन रे झूठ मत बोलो…….।’

‘तीसरी कसम’ में वहीदा रहमान ने भी हीरा बाई की भूमिका के साथ पूरा न्याय किया था। फ़िल्म का परिदृश्य ग्रामीण था और हीरा बाई ने नौटंकी में जो गीत गाए उनके मूल में भी आंचलिक परिवेश शामिल था फिर चाहे वो पान से रंगे लाल होंठो की बात हो या फिर गुलफाम की कहानी हो।

प्रेम और आंचलिकता को समेटे फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पढ़कर शैलेंद्र ने इसे फ़िल्म के रूप में बनाने का निर्णय 1963 में ही ले लिया था। इस एक तरफा प्रेम को प्रकट करने के लिए पहले महमूद और मीना कुमारी को इस फ़िल्म के लिए चुना गया था लेकिन फिर राजकपूर और वहीदा रहमान ने इस फ़िल्म में काम किया। वो राजकपूर ही थे जिन्होंने आवश्यकता पड़ने पर शैलेंद्र को सहारा दिया था।

‘तीसरी कसम’ की कहानी में गाड़ीवान हीरामन पिछले बीस साल से गाड़ी चला रहा है और उसका नाम गाड़ीवानों में बड़ी इज्ज़त से लिया जाता है। भोला-भाला हीरामन हमेशा अपने बैलों से ही अपने दिल का हाल कहता रहता है। वह अक्सर इस बात को याद करता है कि बहुत पहले अपनी गाड़ी में तस्करी के माल के साथ वह पकड़ा गया था और तब उसने यह कसम खाई थी कि वह कभी भी चोरी-चकारी का सामान अपनी गाड़ी में नहीं लादेगा। कुछ वर्षों बाद उसकी गाड़ी में बांस लादे जाते हैं और वह बहुत परेशानियों का सामना करता है। इन परेशानियों के कारण वह अपने बैलों के सामने दूसरी कसम खाता है कि अब वह कभी भी इस तरह का सामान अपने गाड़ी में नहीं ले जाएगा।

अब जब हीरामन की गाड़ी को नाटक कंपनी किराए पर लेती है तो वह बहुत खुश होता है। नाटक कंपनी की नायिका हीराबाई को देखकर वह उस पर मोहित हो जाता है। हीरामन हर मोड़ पर उसकी मदद करने की ठान लेता है और उसकी पूरी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर लेता है। हीराबाई उसके मन की बात समझ जाती है लेकिन नौटंकी में नाचना उसकी मजबूरी भी है क्योंकि उसकी जीविका का यही एकमात्र साधन है। आखिर एक दिन हीराबाई की नाटक कंपनी के साथ ही हीराबाई स्वयं भी चली जाती है और टूटे हुए दिल के साथ हीरामन तीसरी कसम खाता है कि अब वह कभी भी किसी नाचने वाली औरत को अपनी गाड़ी में नहीं बैठाएगा।

इस प्रेम कहानी में प्रेम अधूरा रहा लेकिन इस फ़िल्म ने राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार जीता। जब तक इस पुरस्कार की घोषणा होती तब तक बहुत देर हो चुकी थी। राजकपूर ने पहले तो शैलेंद्र को मना किया कि साहित्यिक मनोभाव पर फ़िल्म न बनाए लेकिन शैलेंद्र पर कोई धुन सवार थी। फिर राजकपूर ने उन्हें यह भी समझाया कि कुछ इधर-उधर और मनोरंजन प्रधान घटनाओं का समावेश किया जाए जिससे फ़िल्म सभी वर्गों के दर्शक खींच सके लेकिन शैलेंद्र ने कहानी को ही मूल माना। परिणाम यह हुआ कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चल सकी और शैलेंद्र को गहरा सदमा लगा।

शैलेंद्र इस सदमे से उबर नहीं पाए और शराब के नशे में डूबते चले गए। राजकपूर ने उनकी वित्तीय मदद भी की। 14 दिसंबर 1966 को जब राजकपूर अपना जन्मदिन मनाने की तैयारी कर रहे थे, उनके पास एक फोन आया और यह सूचना मिली कि शैलेंद्र नहीं रहे। उस समय शैलेंद्र की उम्र मात्र तियालीस वर्ष थी। इसके बाद राजकपूर ने कभी भी अपना जन्मदिन नहीं मनाया।

‘तीसरी कसम’ अपने प्रदर्शन पर कोई कमाल नहीं कर सकी और बुरी तरह असफल रही। वर्ष 1967 में जब इस फ़िल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला तो फ़िल्म समीक्षकों ने इसकी पुन: समीक्षा की और यह फ़िल्म कालजयी रचना बन गई। आज भी ‘तीसरी कसम’ सबसे अधिक क्लासिकल फ़िल्म मानी जाती है। ‘तीसरी कसम’ को ख्वाजा अहमद अब्बास ने ‘सेल्यूलाइड पर लिखी कविता कहा’ क्योंकि इस फ़िल्म मे जो प्रेम दर्शाया गया है वह प्रत्येक भावुक हृदय मन को झंझोड़ कर रख देता है। नायक और नायिका के संवादों में खुशी भी है और वेदना भी जो किसी भी प्रेमी को प्यार की असली भाषा पढ़ाने में सक्षम है।

अब इस रिश्ते को क्या नाम दिया जाए कि 14 दिसंबर को राजकपूर की जयंती मनाई जाती है और शैलेंद्र की पुण्यतिथि। राजकपूर पंजाबी परिवार से थे और उनके पिता पृथ्वीराज कपूर फिल्मों और थियेटर में काम करने की चाह में पाकिस्तान से आकार बंबई में बस गए थे। इधर शैलेंद्र के पिता बिहार से ताल्लुक रखते थे जबकि वह फौज में होने के कारण रावलपिंडी में रहते थे। शैलेंद्र का जन्म रावलपिंडी में ही हुआ था। राजकपूर फिल्मी लाइन में आ गए और साहित्यप्रेमी शैलेंद्र रेलवे की नौकरी करते हुए बंबई पहुँच गए और वहाँ भी उनसे कविता नहीं छूटी। देश की आज़ादी पर आधारित एक कवि सम्मेलन में शैलेंद्र ने एक गीत सुनाया तो राजकपूर उनसे बेहद प्रभावित हुए। राजकपूर ने वही गीत अपनी बनती हुई पहली फ़िल्म ‘आग’ के लिए मांगा लेकिन शैलेंद्र ने यह कहते हुए मना कर दिया कि वह पैसे के लिए नहीं लिखते। फिर समय ने कुछ ऐसी करवट बदली कि शैलेंद्र ने राजकपूर के लिए ‘बरसात’ फ़िल्म के दो गीत रचे और राजकपूर ने उन्हें कविराज कहकर संबोधित किया।

वास्तविक ज़िंदगी में शैलेंद्र और राजकपूर एक दूसरे के पूरक थे और उनका यह रिश्ता कुदरत ने भी कुछ ऐसा ही लिख दिया। राजकपूर ने अपने दोस्त के निधन के बाद कहा था, “मेरे दोस्त ने जाने के लिए कौन सा दिन चुना, किसी का जन्म, किसी का मरण. कवि था ना, इस बात को ख़ूब समझता था।” आज सभी सिनेप्रेमी इन दोनों को एक ही दिन याद करते हैं और गा उठते हैं ‘सजनवा बैरी हो गए हमार…….।’Courtesy: Facebook Wall Mukesh Popli