राजनीतिक दांवपेच में उलझा जनकल्याण का मसला  

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—–प्रद्युम्न शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार

जयपुर, 26 अगस्त । राजस्थान में सिंचाई और पेयजल क्षेत्र में बड़ी क्रांति की उम्मीद की जा रही है। यह क्रांति पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना के माध्यम से आएगी, जिसके लिए केंद्र सरकार की अनिच्छा और मध्य प्रदेश सरकार के असहयोग के बावजूद, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के दम पर ही भागीरथी प्रयत्न कर रहे हैं।

पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना  बेहद महत्वाकांक्षी परियोजना है जिससे राजस्थान का वृहद भूभाग तो पर्याप्त संचित होगा ही करोड़ों लोगों की प्यास भी बुझेगी। इसके साथ ही ई आर सी पी के दम पर व्यापक जल संचय होने से राज्य के फ्लोरा- फोना पर भी सकारात्मक असर आएगा। हर वर्ष वर्षा काल में पार्वती, कालीसिंध, मेज, परबन, चंबल  जैसी नदियों से व्यर्थ बहकर जा रही जल राशि का भी सदुपयोग हो सकेगा। इस परियोजना के तहत पहला बेराज इटावा क्षेत्र में नोनेरा में बन रहा है। इसका 80% से अधिक निर्माण कार्य पूरा हो चुका है।

परियोजना बहुत अच्छी, दूरगामी प्रभाव और करोड़ों राजस्थान वासियों के जीवन में सुख मय बदलाव लाने वाली है। दुर्भाग्य से इसकी यही खूबियां इसके लिए अभिशाप बन रही है। यक्ष प्रश्न यह है कि योजना का श्रेय किसे मिले?  इस के लिए ही  योजना अब तक लंबित है।  मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार  योजना को हर हाल में लागू करने के लिए संकल्पित है।  सीमित संसाधनों के बावजूद इस पर अब तक दस हजार करोड़ रुपए खर्च करने  की सहमति दे चुकी है। लेकिन शायद केन्द्र की   सरकार को यह प्रगति  रास नहीं आ रही है।

अनेक ऐसे लोग हैं जिनके राजनीतिक  उद्देश्यों की पूर्ति में यह योजना बाधक प्रतीत हो रही है। हो सकता है कि कुछ तकनीकी बातें भी हों  मगर कोई तकनीकी उलझन है तो उसे वार्ता की मेज पर सुलझाया जा सकता है। लेकिन अगर कोई राजनीतिक उलझन है तो उसका समाधान बहुत कठिन है। केंद्र सरकार से ई आर सी पी के लिए ना तो हां करते बन रहा है और ना- ना। येन केन मध्य प्रदेश सरकार के पाले में गेंद डालकर केंद्र इस योजना को टालता आ रहा है। राजस्थान सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से निरंतर अनुरोध करती रही है कि ईआरसीपी को राष्ट्रीय महत्व का दर्जा दिया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी दो बार इस आशय  का आश्वासन दे चुके हैं। मुख्यमंत्री गहलोत ने तो प्रधानमंत्री के समक्ष स्वयं यह मसला उठाया मगर केंद्र सरकार चुप्पी साध गई। संयोग से केंद्रीय जल संसाधन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत भी राजस्थान से ही हैं। उन्हीं के मंत्रालय को यह फाइल क्लियर करनी है मगर 6 बैराज और एक बांध वाली इस परियोजना को ऐसा लगता है, जैसे बांधकर एक कोने में डाल दिया गया हो।

सर्वप्रथम तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई ने देशभर में नदियों को जोड़ने का विलक्षण प्रस्ताव दिया था। अब जब यह सपना साकार करने का समय आया है तब उनके अनुयाई इस परियोजना को रोके बैठे हैं। राष्ट्रीय महत्व का दर्जा प्राप्त होने पर परियोजना की 90% लागत केंद्र सरकार वहन करती है और 10% लागत राज्य को वहन करना होता है । लेकिन केंद्र  के ना नुकर के बाद राजस्थान सरकार ने अपने दम पर परियोजना को पूरा करने का बीड़ा उठाया है। अनुमानित 48000 करोड रुपए की इस परियोजना में जितना विलंब होगा उतनी ही लागत बढ़ती चली जाएगी। इस राजनीतिक ईर्ष्या का भार प्रदेश की जनता पर ही अंततः आएगा।

आरंभ में ई आर सी पी की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तेरह जिलों की जरुरतों  को ध्यान में रखकर तैयार की गई थी।  अब जिलों का पुनर्गठन होने से लाभांवित जिलों की संख्या भी बढ़ चुकी है। इस परियोजना से राज्य के 2 लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में सिंचाई सुविधाएं विकसित हो सकेंगी। राज्य की 40% आबादी को पेयजल भी सुलभ होगा । झालावाड़, बारां ,कोटा, बूंदी, सवाई माधोपुर ,करौली, धौलपुर ,दौसा, भरतपुर और अलवर उन 13 जिलों में शामिल है जिनके निवासियों और कृषकों को इस परियोजना से लाभ होगा। इस सूची में गंगापुर सिटी और बहरोड जैसे नवगठित जिले भी अब शामिल हो जाएंगे।  जयपुर अजमेर और टोंक जिलों को भी निरंतर   पेयजल एवं सिंचाई का पानी इसी योजना से मिलना है।

मानसून के दिनों में पार्वती, कालीसिंध और मेज नदी के अतिरिक्त जल को बनास, मोरेल, बांण गंगा और गंभीरी नदी तक पहुंचाया जाना है। वास्तव में इस परियोजना से प्रदेश की 11 नदियों को आपस में जोड़ा जा सकेगा। ईआरसीपी का मुख्य उद्देश्य नदियों से व्यर्थ बहकर जा रहे पानी को 6 बैराज तथा एक बांध का निर्माण कर सिंचाई पेयजल के लिए एकत्र करना है। योजना के अनुसार बारां जिले के शाहबाद तहसील में कुंन्नू नदी पर कुंन्नू बैराज, किशनगढ़ तहसील में कूल नदी पर रामगढ़ बैराज और मांगरोल तहसील में पार्वती नदी पर महल पुर बैराज प्रस्तावित है। कोटा जिले की पीपल्दा तहसील में नोनेरा बैराज, बूंदी जिले की इंदरगढ़ तहसील में मेज नदी पर बैराज और सवाई माधोपुर में चौथ का बरवाड़ा तहसील में बनास नदी पर  बैराज का निर्माण होना है। साथ ही खंडार तहसील में डूंगरी बांध का निर्माण होगा जहां 2099 एमसीएम भराव क्षमता तक परियोजना के लिए जल एकत्र किया जा सकेगा।

पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना से लाभान्वित होने वाले जिलों के 26 जिलों में पर्याप्त जल राशि उपलब्ध रहेगी। मध्य प्रदेश राजस्थान अंतर राज्य कंट्रोल बोर्ड की वर्ष 2005 में हुई बैठक में लिए गए निर्णय के अनुरूप इस परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार हुई थी। निर्णय था कि राज्य किसी भी परियोजना के लिए अपने राज्य के केचमेंट एरिया से प्राप्त जल और दूसरे राज्य के कैचमेंट क्षेत्र से प्राप्त पानी के 10% तक उपयोग कर सकते हैं, बशर्ते कि परियोजना में आने वाले बांध और बैराज का डूब क्षेत्र उसी राज्य तक सीमित हो। ऐसी स्थिति में पड़ोसी राज्य की सहमति जरूरी नहीं होती। राजस्थान यह शर्तें पूरी करता है किंतु केंद्र सरकार निरंतर मध्य प्रदेश से एनओसी लाने का दबाव बनाती रही है। आरम्भ में तो मध्य प्रदेश में 50 के स्थान पर 75% जल निर्भरता के अनुरूप  डीपीआर बनाने का सुझाव दिया था ।इसी बात को आधार बनाकर केंद्र आरसीपी को लटकाए हुए हैं।

केंद्र का हमेशा तर्क रहा है कि राजस्थान सरकार परियोजना की शर्तों के अनुरूप कार्य नहीं कर रही है। वास्तव में इस विषय पर संवादहीनता की स्थिति है। अब जबकि राजस्थान और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों में चुनाव सिर पर हैं तब ईआरसीपी का मामला भी गरमाने लगा है। पूर्वी राजस्थान की किसानों का एक दल हाल ही में मुख्यमंत्री से मिलकर इआरसीपी लागू करने की मांग कर चुका है। निश्चित रूप से चुनाव के दौरान यह भी एक मुद्दा होगा इतना जरूर है कि दोनों राज्यों में एक ही दल की सरकार आने के बाद इसके समाधान के आसार बढ़ जाएंगे।

राजस्थान सरकार ने पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना निगम की स्थापना कर  परियोजना पर पूरी क्षमता के साथ काम शुरु कर दिया है। सरकार नेवर्ष 20 21- 22 के बजट में नौनेरा, गलवा- बीसलपुर- ईसरदा लिंक और धोलपुर जिले में काली नीर लिफ्ट सिंचाई परियोजना काम शुरु करने के लिए 320 करोड रुपए स्वीकृत किए थे। वर्ष 2022-23 के बजट में नौनेरा- गलवा- बीसलपुर- ईसरदा लिंक, महलपुर बैराज और रामगढ़ बैराज के लिए 9600 करोड रुपए स्वीकृत किया। नौनेरा और ईसरदा बांध निर्माण पर 1130 करोड रुपए खर्च किए जा चुके हैं। राज्य का बजट 2 लाख करोड़  के आसपास होता है। इस दृष्टि से इस परियोजना को सरकार अपने दम पर भी पूरा करना चाहे तो पूरी तरह मुमकिन है।

ई आर सीपी की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट वर्ष 2017 में श्रीमती वसुंधरा राजे की कार्यकाल में बनी थी। अगले वर्ष 2018 में राज्य में अशोक गहलोत सरकार पदारूढ हो गई। मुख्यमंत्री ने केंद्र के समक्ष  ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा देने की मांग उठाई। तब से मुख्यमंत्री केंद्र को अनेक पत्र लिख चुके हैं। सर्वदलीय बैठक भी बुलाई जा चुकी।  विपक्ष तकनीकी खामियां दूर करने पर जोर देता रहा है । जब पानी और पैसा दोनों राजस्थान का है तब मध्य प्रदेश से एनओसी की अनिवार्यता का हल निकाला जाना चाहिए ताकि राज्य की जनता के हित में परियोजना पूरी हो सके।

मासिक समाचार पत्र ” माइंड प्लस ”  से साभार