राजस्थान की जनता अपने स्वाभिमान पर चोट बर्दाश्त नहीं करती ।

people- of- Rajasthan -do -not -tolerate- injury -to- their- self-respect-

गोविन्द चतुर्वेदी

वरिष्ठ पत्रकार

राजस्थान विधानसभा की करणपुर सीट विपक्ष में बैठी कांग्रेस के रुपिंदर सिंह कुन्नर ने जीत ली। एक माह पहले ही राज्य में सत्तारूढ़ हुई भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार सुरेन्द्र पाल सिंह टीटी को हरसंभव प्रयासों के बावजूद, पराजय का मुंह देखना पड़ा। यह पराजय भी 100 – 50 वोटों की नहीं थी। यह करीब 12 हज़ार वोटों से हुई जो एक विधानसभा क्षेत्र के लिए हार- जीत का ठीक-ठीक अंतर है। न ज्यादा, न कम। यहां हरसंभव प्रयास शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया गया है क्योंकि भाजपा ने चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद अपने प्रत्याशी को राज्य सरकार में मंत्री तक बना दिया और विभाग भी वही दिए जो चुनाव वाले क्षेत्र सहित सम्पूर्ण गंगानगर-हनुमानगढ़ जिलों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

 

टीटी को मंत्री बनाए जाने को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में ही नहीं बल्कि कानून और समाज से जुड़े लोगों में भी अच्छी बहस हुई। भाजपा जहां किसी को भी मंत्री बनाने और छह माह में सदन का सदस्य बनाने के कानूनी प्रावधान की आड़ लेती रही वहीं कांग्रेस का कहना था कि, चुनाव के बीच ऐसा किया जाना अनैतिक और चुनावी आचार संहिता का खुला उल्लंघन है। कानून और समाज के लोग भले इस मुद्दे पर चली बहस में बंटे हुए थे लेकिन ज्यादातर का कहना था कि, भारतीय जनता पार्टी को प्रदेश ही नहीं देश के लोकतंत्री इतिहास के इस “अभिनव प्रयोग” से बचना चाहिए था। यदि वह ऐसा नहीं करती तो शायद करणपुर की जनता उतनी गहरी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती। चुनाव नतीजों के बाद विभिन्न टीवी चैनलों पर हुई बहस में भी यह सामने आया कि, राजस्थान की जनता का “स्वाभिमानी मिजाज़” हजारों वर्षों से इतिहास में दर्ज है। वह रूखी और घास की रोटी खा लेती है लेकिन अपने स्वाभिमान पर चोट बर्दाश्त नहीं करती और चलते चुनाव में टीटी को मंत्री बनाए जाने से उसे लगा कि यह उसे लुभाने-लालच देने के लिए किया गया है।

 

कांग्रेस प्रत्याशी रुपिंदर सिंह कुन्नर के पिता गुरमीत सिंह कुन्नर द्वारा अपने राजनीतिक जीवन में क्षेत्र की जनता के लिए किया काम और उनके निधन से उपजी सहानुभूति साथ थी ही, ऐसे में उनके बेटे की विधानसभा पहुंचने की राह आसान हो गई। लेकिन करणपुर का चुनाव परिणाम इन्हीं कारणों पर नहीं आया! इसके पीछे दोनों ही ओर के कुछ और भी कारण थे, जिनका यहां जिक्र करना जरूरी है। पहले बात कांग्रेस की।उसने रुपिंदर के रूप में एक ऐसा नया और युवा चेहरा क्षेत्र की जनता के सामने रखा जिसे अपने पिता के राजनीतिक जीवन को नज़दीक से देखने और उनके साथ काम करने का अनुभव भी था। उधर भारतीय जनता पार्टी की ओर से मैदान में टीटी थे जो उम्र में रुपिंदर से दुगुने होने के साथ पिछले 25 वर्षों से क्षेत्र में भाजपा के चेहरे थे। वे दो बार जीते तो तीन बार हारे। जीते तो दोनों बार श्रीमती वसुंधरा राजे सिंधिया की मंत्रिपरिषद में मंत्री बने। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि, टीटी अपने क्षेत्र की जनता के मूड को जानते हैं इसलिए खुद चुनाव प्रक्रिया के चलते मंत्री बनने के इच्छुक नहीं थे लेकिन पार्टी नेतृत्व के निर्देशों के चलते वे कुछ कर नहीं पाए और हार की आशंका,सुनिश्चित हार में बदल गई।

 

वैसे ही जैसे भाजपाई लहर के बावजूद 1993 में देश के भाजपाई दिग्गज भैरोंसिंह शेखावत श्रीगंगानगर में हारे। हारे ही नहीं तीसरे स्थान पर रहे। उस वक्त जीत कांग्रेस के राधेश्याम गंगानगर की हुई और शेखावत की हार की नींव सुरेन्द्र सिंह राठौड़ ने रखी जो राज्य के दिग्गज समाजवादी नेता प्रोफेसर केदार के शिष्य थे। यह तो शेखावत ने, वर्ष 1971 में जयपुर की गांधीनगर सीट से हुई चुनावी हार के बाद अति सुरक्षित क्षेत्र या अनेक अवसरों पर दो क्षेत्रों से चुनाव लड़ने की नीति अपनाई हुई थी। इसी के तहत 1993 में वे पाली की बाली सीट से भी लड़े और जीते थे अन्यथा उन्हें भारी पड़ता। कहने का मतलब इस क्षेत्र की जनता पद और कद से ज्यादा महत्व अपनी प्रतिष्ठा को देती है। दूसरे कांग्रेस ने यह चुनाव मिलकर और स्थानीय नेतृत्व तथा कार्यकर्ताओं के भरोसे वाली उस रणनीति पर लड़ा जिस पर मुख्यमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल में  अशोक गहलोत ने अजमेर पश्चिम का चुनाव लड़ा था। इस रणनीति के तहत कांग्रेस की ओर से उम्मीदवार तय करने के बाद चुनाव लड़ने का पूरा जिम्मा स्थानीय नेतृत्व पर छोड़ दिया गया।

 

गहलोत सहित प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा और पूर्व अध्यक्ष सचिन पायलट ने चुनावी दौरे किए लेकिन घर घर पहुंचने का काम शंकर पन्नू, सोहनलाल नायक डूंगर राम गेदर, शिमला नायक और अमित चाचान जैसे स्थानीय चेहरों के जिम्मे रहा। इसके विपरीत भारतीय जनता पार्टी वसुन्धरा और गैर वसुन्धरा धड़ों में बंटी रही। पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे की चुनाव अभियान में उपस्थिति नहीं थी। दुनिया दिखाने को जिम्मा राजेन्द्र राठौड़ के पास था लेकिन वहां कैम्प संगठन महामंत्री चंद्रशेखर मिश्रा और राज्य के अनेक मंत्रियों की टीम किए हुई थी जो मानकर चल रही थी कि, विधानसभा चुनाव की तरह ही यह चुनाव भी उनका जीता हुआ ही है। जान बूझकर या अनजाने में, उन्होंने श्रीमती वसुंधरा राजे को क्षेत्र में प्रचार के लिए बुलाया ही नहीं जबकि स्थानीय पार्टी नेताओं के साथ मतदाताओं में भी उनकी अभी अच्छी पैठ है। ऐसे में उनके समर्थक भी ज्यादा सक्रिय नज़र नहीं आए।

 

तीसरी बात नई सरकार और उसका नया नेतृत्व अपने एक माह के छोटे से कार्यकाल में ज्यादा कोई काम तो कर नहीं पाया उल्टे मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल के चयन तथा उन्हें विभागों के वितरण जैसे सामान्य कामों में हुई देरी और हर निर्णय में दिल्ली के दखल की खबरों ने माहौल को और बिगाड़ा। उधर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की छवि, उनकी सरकार की योजना और स्कीमों के असर तथा उनमें से चिरंजीवी और आरजीएचएस जैसी योजनाओं के बंद होने की खबरों ने मतदाता के गुस्से को और बढ़ा दिया। करणपुर में भाजपा की हार में, टीटी को मंत्री बनाने पर चुनाव आयोग के मौन का योगदान भी कम नहीं है। यदि वह पहले या बाद में, जब भी उससे सलाह ली गई, अपनी निष्पक्ष सलाह और बाद में निर्देश देता, एक्शन करता तो भी जनता का रुख प्रभावित होता। लेकिन जब उसने सारी बातों को देखा और उन्हें एक कड़ी के रूप में पिरोया तो उसे लगा कि, इस सबसे चुनौती कांग्रेस को नहीं उसे दी जा रही है तो वह मुकाबिल हो गई और परिणाम सामने है। इस हार का सन्देश साफ है – भाजपा राजस्थान और उसकी जनता के बारे में जो भी तय करे, यहीं तय करे और यहीं के नेता कार्यकर्ता और जनता से सलाह करके करे, अन्यथा परिणाम ऐसे ही चौंकाने वाले हो सकते हैं।

साभारः समाचार पत्र माइंड प्लस 15 जनवरी 2024 के अंक से